आपदा प्रबंधन
आपदा क्या है ?
सामान्य परिस्थितियों से हटकर जब असामान्य परिस्थितियां पैदा हो जाए ,परिणाम स्वरूप जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो ,आपदा कहलाता है ।
आपदा दो प्रकार की हो सकती है -
प्राकृतिक एवं मानव जनित
प्राकृतिक आपदा में -अति वर्षा ,बाढ़ , सूखा ,भूकंप , सुनामी ,चक्रवात ,बादल फटना ,आकाशीय बिजली गिरना ,भूस्खलन ,अकाल ,जंगलों में आग लगना आदि ।
मानव जनित आपदा में -आतंकवाद , दंगे , महामारी , बम विस्फोट , प्रदूषण , पर्यावरण असंतुलन , उद्योग धंधों तथा कारखानों से निकलने वाली जहरीली गैस से पर्यावरण को नुकसान पहुंचना, उद्योग धंधों , कारखानों से निकलने वाला कचरा , युद्ध एवं गृह युद्ध आदि , मानव जनित आपदाओं में शामिल होती हैं ।
आपदा प्रबंधन दो स्तर पर कार्य करता है - आपदा से पूर्व एवं आपदा के पश्चात ।
आपदा प्रबंधन का बड़े सरल शब्दों में अर्थ है आपदा के घटित होने से पूर्व ही आपदा से निबटने का प्रबंध कर लिया जाए । इस प्रकार का कदम अच्छी प्रशासनिक व्यवस्था की पहचान है । यह नहीं कि कोई आपदा घटित हो उसके बाद उस आपदा पर चर्चा हो । आपदा से हुई जान माल की हानि को कैसे हल किया जाए ,इस पर चर्चा हो आदि ।
आपदा प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय ,प्रांतीय ,जिला स्तर पर भारी व्यवस्था की जाती है ,जो जान माल की हानि होने वाली है (आपदा आने से )उससे स्थानीय जनता को अलर्ट किया जाता है ।जान-माल का भारी नुकसान न हो ,इसके लिए सुरक्षित स्थानों पर इंसान और पशुधन को भेजने की व्यवस्था की जाती है ।
आपदा नियंत्रण कक्ष स्थापित किए जाते हैं । मानसून को लेकर मौसम विभाग भारी से अत्यंत भारी वर्षा की चेतावनी जारी करता है । इसको लेकर ' येलो अलर्ट ' जारी किया जाता है । सभी जिलों के प्रशासन को सतर्क रहने का निर्देश दिया जाता है । सभी जिलों में स्थापित आपदा नियंत्रण कक्षों को सक्रिय रहने के लिए कहा जाता है । इस दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में सफर नहीं करने और नदी - नालों से दूर रहने की सलाह दी जाती है ।
चूंकि प्राकृतिक आपदा को घटने से नहीं रोका जा सकता है , यथा - बादल अचानक फटता है उसको फटने से नहीं रोका जा सकता है , भूकंप अचानक आता है , भूकंप को आने से नहीं रोका जा सकता है लेकिन बादल फटने ,भूकंप आने से उत्पन्न आपदा से ' त्वरित एवं सशक्त ' रूप से निबटने के लिए प्रशासनिक स्तर पर अग्रिम तैयारी रखी जाती है ।
हाल ही के वर्षा काल में उत्तराखंड में देहरादून की जिलाधिकारी सुश्री सोनिका का उदाहरण बड़ा सटीक बैठता है । वर्षा काल को ध्यान में रखते हुए ,आपदा प्रबंधन को प्रभावी बनाने के लिए ,जिलाधिकारी सोनिका एवम् वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक दलीप सिंह कुंवर ने अधिकारियों के साथ बैठक की । जिलाधिकारी ने लोक निर्माण विभाग , पीएमजीएसवाई एवं राष्ट्रीय राजमार्ग खंड के अधिकारियों को निर्देश दिए कि आपदा संभावित क्षेत्रों को चिन्हित किया जाए । ऐसे सभी स्थलों पर जेसीबी तैनात रखी जाए ,साथ ही जेसीबी के वाहन चालकों के नंबर विभिन्न माध्यमों से प्रसारित कराए जाएं ताकि आवश्यकता पड़ने पर जनता उनकी मदद प्राप्त कर सकें । सभी अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वह अपना मोबाइल 24 घंटे ऑन रखें । बिंदाल नदी के किनारे रहने वाले लोगों को चिन्हित किया जाए एवं आवश्यकतानुसार आपात स्थिति में उन्हें अन्यत्र शिफ्ट करने के लिए स्थान तय किए जाएं । वर्षा काल में सभी मार्ग बाधित होते रहते हैं ऐसी स्थिति में दूरस्थ क्षेत्रों में 3 माह का खाद्यान्न कोटा समय पर भिजवा दिया जाए।
आपदा प्रबंधन का यह प्रयास एक बानगी हर है ।
प्राकृतिक आपदा में स्त्रियां ,गर्भवती स्त्रियां ,स्तनपान कराने वाली माएं, दुध मुहे बच्चे जिस बुरी तरह से प्रभावित होते हैं उसे देख कर रूह कांप जाती है ।
अगर हम चक्रवात की बात करें तो हमें याद आएगा कि हमारे देश में वर्ष 1999 में आंध्र प्रदेश में भारी चक्रवात आया था । इसमें जान-माल की भारी क्षति हुई थी ।
पहाड़ों पर मौत का तांडव ,जान और माल का भारी नुकसान करता है ।लद्दाख ,उत्तराखंड ,अरुणाचल में बादल फटने की घटना एक दशक से कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं । बादल फटने की स्थिति में करोड़ों लीटर पानी एक साथ बरसता है जो अपने साथ सब कुछ बहा कर ले जाता है । विनाश की अपार लीला चारों ओर दिखाई देती है । पिछले वर्ष 2021 फरवरी माह में चमोली में घटित घटना (जिस में बादल फटा था) हम भूले नहीं हैं ,चारों तरफ देखते ही देखते बर्बादी का मंजर खड़ा हो गया सब कुछ खत्म था। जम्मू कश्मीर के बारामूला में 20 जुलाई 2022 को बादल फटा । लोग हतप्रभ थे सड़क नदी में तब्दील हो चुकी थी ।
केदारनाथ 16जून 2013 की घटना अभी भी भुलाए नहीं भूलती है । संपूर्ण उत्तराखंड में मूसलाधार बारिश हो रही थी । स्थान स्थान पर बादल फट रहे थे । चौड़ा बाड़ी ग्लेशियर अचानक पिघला और मंदाकिनी नदी अपने साथ सब कुछ बहा कर ले गई । केदारनाथ की भीषण तबाही ....केदार पुरी पूर्णतया तबाह हो गई । अपार जन धन ,पशु धन की हानि हुई। केदारनाथ हादसे से पूरा देश हिल गया था । हजारों तीर्थ यात्री मारे गए ।हजारों स्थानीय लोग मारे गए ।असंख्य पुल , नेशनल हाईवे ,सड़कें ,होटल सब कुछ तबाह हो गया ।
सेना के जवान रेस्क्यू ऑपरेशन में जुट गए सेना के जवानों ने एक लाख 10000 लोगों की जान बचाई । नेवी के गोताखोर लगाए गए । 1 महीने से ज्यादा राहत और बचाव के काम चलते रहे ।
केंद्र में इस समय ' यूपीए ' की सरकार थी एवं उत्तराखंड में श्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी ।श्री विजय बहुगुणा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे । गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गुजराती श्रद्धालुओं को निकालने के लिए दो करोड़ की तत्कालिक सहायता एवं गुजरात के अधिकारियों के साथ रेस्क्यू टीम भी भेजी । श्री नरेन्द्र मोदी जी ने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से बात की । केदारनाथ के पुनर्निर्माण में भागीदारी की प्रार्थना की ,जिसको उत्तराखंड सरकार ने शुरू में तो मान लिया लेकिन बाद में उत्तराखंड राज्य सरकार ने मोदी जी की सहायता की प्रार्थना को स्वीकार करने से इंकार कर दिया।
जून 2022 में अमरनाथ गुफा के पास ही अचानक बादल फटा ... देखते ही देखते तीर्थयात्री , श्रद्धालु आराम करने के लिए लगाए गए टेंट , विशाल पैमाने पर लगाए गए लंगर ,आयोजक सब कुछ इस प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ गया ।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण -
भारत के प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ( एनडीएमए )भारत में आपदा प्रबंधन के लिए शीर्ष निकाय है एनडीएमए के अंतर्गत राष्ट्रीय ,राज्य और जिला स्तर पर संस्थागत तंत्र के लिए एक सक्षम वातावरण के निर्माण को आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 द्वारा अनिवार्य किया गया है ।
कॉविड 19 के दौरान भी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सामने कुछ समस्याएं भी हैं , जैसे - जनसंख्या में अपार वृद्धि परिणाम स्वरूप गरीबी बढ़ना। अशिक्षा ,जानकारी की कमी आदि कुछ ऐसे तत्व हैं जो राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के समय एक समस्या बनकर खड़े हो जाते हैं । जरूरतमंद लोगों तक अधिक से अधिक सहायता पहुंच सके इसके लिए देश में बढ़ती हुई जनसंख्या पर विचार अब जरूरी सा हो गया है ।


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