कन्याकुमारी से केरल रवानगी
- Shashi Prabha
- 26 जन॰
- 4 मिनट पठन
कन्याकुमारी से केरल रवानगी -
कन्याकुमारी से केरल की ओर चलने पर बहुत सुखद महसूस हो रहा था । प्राकृतिक सौंदर्य दोनों तरफ बिखरा पड़ा था । पदम नाभा स्वामी मंदिर ,रामेश्वरम और धनुषकोडी के दर्शन की तीव्र इच्छा ,दक्षिण भारत ट्रिप का महत्वपूर्ण कारण बनी थी और अब वही घड़ी मेरे सामने थी जब मैं कन्याकुमारी से श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की ओर जा रही थी।
श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर -
केरल की ओर अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए आगे बढ़ रहे थे हम सुबह 9:00 बजे श्री पदम नाभास्वामी मंदिर के सामने खड़े थे । हमारे ग्रुप की सभी महिलाएं , युवतियां बाकायदा साड़ी पहनकर तैयार होकर होटल से चली थी । पदम नाभा स्वामी कैंपस में हमने देखा कि पुरुषों के धारण करने के लिए अनिवार्य अंगवस्त्र भी बाहर बिक रहे थे ।जो पुरूष एवम् स्त्रियां साड़ी या अंगवस्त्र नहीं पहनकर आए थे उनको बहुत सुंदर सी गोल्डन किनारे वाली साड़ियां,अंगवस्त्र किराए पर भी मिल रही थी । खरीद भी रहे थे ,जैसा जिसको ' सूट ' कर रहा था । स्त्रियां भी जो स्कर्ट या जींस पहने हुए थी साड़ियां खरीद कर कर उन्हीं के ऊपर लपेट रही थी । किसी भी प्रकार का लेदर से संबंधित सामान , घड़ी का स्ट्रैप हो या पर्स हो या जींस की बेल्ट हो , की अनुमति नहीं थी । फोन की तो अनुमति थी ही नहीं अंदर ले जाने की। बहरहाल हम पूरी तरह से तैयार होकर लाइन में लग गए । मुझे याद आ रहा है कि उस दिन संडे था और संडे में विशेष सेवा टिकट जो लगभग ₹500 का आता है उस दिन बंद था । उस दिन सबके लिए फ्री दर्शन था चाहे वह किसी भी आयु ग्रुप का हो। लाईन बहुत लंबी थी, लग नहीं रहा था कि आज दर्शन हो जाएंगे शाम को मदुरई पहुंचना था और मदुरई से फिर वापसी करनी थी शाम को।
मंदिर के द्वार पर डिस्प्ले हो रहा था । कुछ-कुछ समय के लिए लाइन को विराम दिया जाता था । भगवान से प्रार्थना की कि प्रभु थोड़ी मदद करो आए हैं तो दर्शन तो दे ही दो अपके दर्शन करके ही जाएंगे । प्रभु आपके Aura में तो आ ही गए हैं बस दर्शन और दे दीजिए । लाईन को थोड़ी थोड़ी देर के लिए विराम लगाया जाता था प्रभु से कहा कि प्लीज प्रभु मदद कीजिए , तो तभी उधर सिक्योरिटी गार्ड खड़ा हुआ था मैंने पूछा कि देखिए अभी तो टाइम होने जा रहा है फिर से लाइन को विराम लग जाएगा ...और उस प्रभु कृपा देखिए लाइन में फिर विराम नहीं लगा । धीरे धीरे लाइन आगे बढ़ रही थी । हमारा नंबर आया हम द्वार से मंदिर चले ।पुरुषों की तरफ से जो लाइन थी उसमें एक युवा जींस के ऊपर धोती पहने हुए लाइन में खड़ा था उसकी व्यग्रता दर्शनों के लिए देखते बनती थी लेकिन सिक्योरिटी गार्ड ने देखा उसकी धोती के नीचे बेल्ट है उसको लाइन से बाहर निकाल लिया गया।
सिक्योरिटी गार्ड्स अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं रख सके युवा की जमकर पिटाई बना दी यहां पर मैं कहना चाहूंगी कि जो भी वह सिक्योरिटी गार्ड्स थे या स्टेट गवर्नमेंट से संबंधित थे या फिर मंदिर प्रशासन से संबंधित थे ,जो भी थे मुझे नहीं मालूम , लेकिन थोड़ा सा स्वभाव में विनम्रता बहुत जरूरी है क्योंकि एक युवा जो कि भगवान में आस्था रखकर दर्शन के लिए पहुंचा है उसको उसके साथ प्यार से पेश आने की आवश्यकता है यह हमारी भारतीय संस्कृति की पहचान है । विनम्रता, दया दान यह हमारे नैतिकता के आभूषण है यह हमसे अलग नहीं छूटने चाहिए । फिर से हमारी लाईन आगे बढ़ी। लगभग डेढ़ घंटा के करीब लाइन में हम लगे रहे । इस दौरान कॉरिडोर में लाइन में चलते हुए मैंने देखा की कॉरिडोर के स्तंभों में बनी हुई पत्थर की मूर्तियां तेल से बुरी तरह से पुती हुई है । देख कर अच्छा नहीं लगा।बड़ा आश्चर्य हुआ मूर्तियों पर तेल पुता देखकर...तेल का हेतु क्या था यह समझ नहीं आया , लेकिन यह मूर्तियों के लिए नुकसानदायक है मूर्तियां तेल के द्वारा धूल आदि में सन जायेंगी और धीरे-धीरे मूर्तियां खत्म हो जाएंगे , ऐसा नहीं होना चाहिए ..... मूर्तियों पर तेल की पुताई नहीं होनी चाहिए तेल पुताई का उद्देश्य क्या है यह मुझे समझ नहीं आया मंदिर प्रशासन को इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
अंत में वह घड़ी आ पहुंची जिसका मुझे बेसब्री से भारी इंतजार था , जिसकी वजह से मैं देहरादून से चली थी कि पता नहीं जीवन में दर्शन हो पाएंगे या नहीं श्री पद्मनाभस्वामी के या रामेश्वर में रामनाथ स्वामी मंदिर के। रामनाथ स्वामी मंदिर के तो दर्शन हो चुके थे लेकिन आज घड़ी थी मेरे सपने के पूरा होने की श्री पदम नाभा स्वामी के दर्शन हेतु बहुत भारी भीड़ थी ....भीड़ क्या भीड़ का समुद्र था मेरे आगे बहुत लोग थे ....लाइन कहीं नजर नहीं आ रही थी । अंदर आकर लाइन टूट चुकी थी । गर्भ गृह के सामने आकर मुझे संभव नहीं लग रहा था कि दर्शन हो पाएंगे । तभी मेरी मित्र बोली यहां सीढ़ियां है इन पर चढ़ जाओ । सीढ़ियों पर चढ़ना बहुत मुश्किल था .... एक कदम भी इधर-उधर उठाया नहीं कुचल जाएंगे । मैं सीढ़ियां चढ़ गई । देखा कि अंदर दीपक जल रहे थे और एक बहुत सुनहरा सा हाथ जगमगा रहा है ...दीपक की रोशनी में मैंने महसूस किया की यही प्रभु पद्मनाभा स्वामी का हाथ है जो शिवलिंग पर रखा हुआ है । एक सेकंड के लिए ही हमको रुकने दिया गया फिर भीड़ को आगे कर दिया गया ... हालांकि मन में इच्छा थी कि प्रभु श्री पदम नाभास्वामी को मन भर कर देखूं ।
शाम को हमारी वापसी मदुरई हो गई। हम मार्केट घूमे।कुछ ड्रेस वगैरा लिया ।वापस अपनी डेस्टिनेशन की ओर बढ़ गए बहुत अच्छा लगा ....बहुत सुखद एहसास हुआ ...इच्छा हुई की बार-बार दर्शन करने के लिए आऊं अनेक बार जाऊं।





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