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खून के रिश्तों का बदलता रंग

  • लेखक की तस्वीर: Shashi Prabha
    Shashi Prabha
  • 7 घंटे पहले
  • 3 मिनट पठन

जैसा की आप  जानते हैं ' बोलते शब्द 'ब्लॉग में किसी एक विशिष्ट मुद्दे को लिखने के लिए नहीं चुना गया है । इसमें कहानी,कविता, लघु कथा एवम् लेखों के माध्यम से, सामाजिक , राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय सभी मुद्दों पर चर्चा होती रही है । आज लेखनी एक ज्वलंत सामाजिक मुद्दे पर चली है । 


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है , समाज में क्या घटित हो रहा है , उसके आसपास के वातावरण में क्या चल रहा है , वह उससे गहराई से प्रभावित होता है । यद्यपि  संवेदन हीन व्यक्ति को इससे कोई सरोकार नहीं है लेकिन संवेदनशील व्यक्ति समाज के मुद्दों से प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता है । समाज के हर वर्ग से जुड़ी मेरी संवेदनशीलता , आज के लेख में मेरी कलम बनी है ।

सामाजिक व्यवस्था से बने रिश्तो की क्या बात करें इनकी बात तो छोड़िए , खून के रिश्तों का रंग भी बदल गया है। इन रिश्तो में भावना , लगाव , दुलार जैसी नैसर्गिक शक्ति नहीं रह गई है इनका स्थान  धोखा ,स्वार्थ एवम् बेईमानी ने ले लिया है ।


मां एवं बेटे के बीच का रिश्ता अनमोल है लेकिन कहीं कहीं यह रिश्ता भी  दम तोड़ता नजर आ रहा है। इस अनमोल रिश्ते पर आर्थिक लालच भारी पड़ रहा है  , परिणाम स्वरूप  मां ने अपने ही  बेटे की  सुपारी  दे दी । यह आश्वस्त होने के बाद कि बेटा मर चुका है मां  ने बेहोश होने का नाटक किया, मां को अस्पताल पहुंचाया गया ... पुलिस को  मां पर शक हुआ, मां से सख्ती से पूछताछ हुई मां ने सच उगल दिया।

  

मां की ममता को लजाने वाला  एक उदाहरण और है,हुआ यूं कि मां के नाजायज संबंध किसी दूसरे पुरुष से बन गए किशोर पुत्र को  इस की जानकारी थी,अब मां के सामने दिक्कत थी कि क्या किया जाए । मां ने बहुत आसान रास्ता निकाला, बेटे को ही रास्ते से हटा दिया ।


बेटियों को मां की परछाई बोला जाता है एक मां को दो पुत्रियां थी। एक विदेश में थी दूसरी मां के साथ  थी। मां के साथ रहने वाली पुत्री ने मां को अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए मां को वृद्धा आश्रम पहुंचा दिया। जो सन्तान विदेश चली गई, उसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है , स्थिति बड़ी विचारणीय है। 


कुछ दिन पूर्व की एक घटना और याद आ गई - मां ने बड़े अभावों के बावजूद बेटी को उच्च शिक्षा दिलाई .. परिश्रम बेटी का था माना.. लेकिन साधनों की व्यवस्था तो मां ने की थी ... इस बेटी को यह कहते हुए सुना गया " इनके लिए तो कितना भी कर दो सब बेकार है ' यह सुनकर मेरा कलेजा मुंह को आ गया ।

आखिर समाज कहां जा रहा है?क्या हो गया है समाज को ? बच्चों को सफल बनाने में हम उनको सफल इंसान बनाना भूल गए । हम बच्चों को मानवीय गुण नहीं दे पाए। 


मां अभाव में रहते हुए भी एक साथ दो-तीन बच्चों को पाल लेती है लेकिन समय आने पर दो-तीन बच्चे मां को नहीं पाल सकते हैं। हाल ही की घटना है  दो बेटे सम्मानित पदों पर सेवा देते हुए अवकाश निवृत्ति को प्राप्त हुए। दोनों बेटे अपने परिवारों के साथ दूसरे  शहर में खुश ... एक बेटे को शिकायत थी  "एक महीने से मां को फोन कर रहा हूं मां फोन नहीं उठा रही है....आज आया हूं तो देखा कि मां तो 15 दिन पहले मर चुकी है .....मुझे तो मालूम ही नहीं था " । अगर मां  से जरा भी भावनात्मक लगाव होता तो फोन क्यों नहीं उठा रही है इसका जरूर पता लगाया जाता , एक महीना इंतजार नहीं किया जाता ।

कुछ संतानें ऐसी भी हैं जो यह नहीं चाहती हैं कि उनके माता-पिता आस पड़ोस से कोई संबंध रखें,वह अपने माता पिता को सामाजिक रुप से एकदम 'आइसोलेट 'रखना चाहती हैं। ये प्रतिबंध सिर्फ माता पिता पर लागू होते हैं.. ऐसी संतानें दीर्घ गामी 'खेल 'खेलती हैं।


ये कुछ उदाहरण लेख की माँग रहे हैं। कुछ संस्कार  दिए जाते हैं कुछ अर्जित किए जाते हैं। संस्कार विहीन समाज ज्यादा दूरी तय नहीं कर पाता है। पाश्चात्य संस्कृति एवम् पूरब संस्कृति में अन्तर है, यह बात एक बार फिर से हमको समझनी होगी।


 
 
 

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